पाठ्यक्रम: GS2/न्यायपालिका; ई-गवर्नेंस
संदर्भ
- उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) के एक निर्णय को निरस्त कर दिया, क्योंकि यह पाया गया कि न्यायाधिकरण ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा उत्पन्न अस्तित्वहीन, फर्जी एवं भ्रमोत्पादक न्यायिक निर्णयों/नज़ीरों पर विश्वास किया था।
परिचय
- इस मामले ने न्यायिक निर्णय-निर्माण में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग को लेकर व्यापक चिंताओं को उजागर किया।
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यद्यपि एआई न्यायिक प्रक्रिया में सहायक भूमिका निभा सकता है, किंतु न्यायनिर्णयन की अंतिम एवं पूर्ण जिम्मेदारी मानव निर्णयकर्ताओं के नियंत्रण में ही रहनी चाहिए।
- न्यायालय ने निर्देश दिया कि सर्वोच्च अधिवक्ता निकाय इस विषय को अत्यंत गंभीरता से ले तथा भविष्य में ऐसी घटनाओं की रोकथाम हेतु दिशानिर्देशक सिद्धांत निर्धारित करे। साथ ही, आवश्यक अनुशासनात्मक कार्रवाई का भी प्रावधान सुनिश्चित किया जाए।
न्यायपालिका में एआई के उपयोग संबंधी उच्चतम न्यायालय के हालिया प्रारूप विनियम
- न्यायालय ने प्रशासनिक कार्यों में एआई के उपयोग की अनुमति प्रदान की है, जिनमें शामिल हैं—
- वाद प्रबंधन
- वाद सूची का निर्माण
- सुनवाई का निर्धारण
- न्यायालयीन कार्यवाहियों का प्रतिलेखन
- निर्णयों का अनुवाद
- न्यायालयीय प्रक्रियाओं में जोखिम मूल्यांकन हेतु एआई प्रणालियों का उपयोग प्रतिबंधित रहेगा। इसमें निम्नलिखित शामिल हैं—
- अभियुक्त के फरार होने की संभावना का आकलन,
- पुनः अपराध करने की संभावना का पूर्वानुमान,
- जमानत पात्रता का मूल्यांकन,
- पक्षकारों अथवा साक्षियों की विश्वसनीयता का निर्धारण।
- एआई प्रणालियों द्वारा व्यक्तिगत डेटा का प्रसंस्करण डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 के प्रावधानों के अनुरूप किया जाएगा।
- एआई प्रणालियाँ जाति, धर्म, नस्ल, लिंग, लैंगिक पहचान, दिव्यांगता, भाषा, आर्थिक स्थिति अथवा संविधान द्वारा निषिद्ध किसी अन्य आधार पर किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रह को बढ़ावा नहीं देंगी।
- एआई-सहायित न्यायिक प्रणालियाँ डिजिटल विभाजन को बढ़ाने वाली नहीं होनी चाहिए तथा न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े सभी हितधारकों के लिए समान रूप से सुलभ रहनी चाहिए।
- न्यायपालिका में एआई के उपयोग की निगरानी हेतु उच्चतम न्यायालय में एक पूर्णकालिक शीर्ष निकाय के गठन का प्रस्ताव किया गया है।
भारत की न्याय प्रणाली में एआई का उपयोग
- उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालयों तथा राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) द्वारा विकसित एआई उपकरण वर्तमान में निम्नलिखित कार्यों में सहायता प्रदान कर रहे हैं—
- मौखिक परिचर्चाओं का प्रतिलेखन।
- न्यायिक निर्णयों का अनुवाद।
- ई-फाइलिंग में त्रुटियों की पहचान।
- विधिक अनुसंधान ।
- मेटाडाटा का निष्कर्षण।
- विगत एक दशक में भारतीय न्यायपालिका ने मूलभूत कंप्यूटरीकरण से आगे बढ़ते हुए राष्ट्रीय डिजिटल मंचों , वास्तविक समय डेटा प्रणालियों , वर्चुअल न्यायालयों तथा बहुभाषी न्यायिक निर्णयों की उपलब्धता जैसी उन्नत व्यवस्थाओं को अपनाया है।
- ई-कोर्ट्स परियोजना के अंतर्गत विकसित सॉफ्टवेयर अनुप्रयोगों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा इसकी उप-प्रौद्योगिकियों, जैसे—
- मशीन लर्निंग ,
- ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकग्निशन,
- प्राकृतिक भाषा संसाधन का व्यापक उपयोग किया जा रहा है।
भारत की न्यायपालिका में एआई के उपयोग का महत्त्व
- लंबित मामलों का निस्तारण: भारत की न्यायिक प्रणाली में बड़ी संख्या में लंबित मामले समयबद्ध न्याय प्रदान करने की क्षमता को प्रभावित करते हैं तथा न्यायपालिका में जनविश्वास को कमजोर करते हैं।
- एआई वाद प्रबंधन को अधिक प्रभावी बनाकर लंबित मामलों में कमी लाने तथा न्यायिक प्रक्रियाओं में तीव्र लाने में सहायक हो सकता है।
- कारागारों में भीड़भाड़ : भारतीय कारागार वर्षों से अपनी निर्धारित क्षमता से अधिक बंदियों को समायोजित कर रहे हैं।
- एआई शिकायत पंजीकरण प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने, जाँच की प्रगति पर निगरानी रखने, आवश्यक कार्रवाई की पहचान करने तथा जाँच की गुणवत्ता का मूल्यांकन करने में सहायक हो सकता है।
- अनुवाद एवं सुगमता: भारत में 22 अनुसूचित भाषाएँ तथा सैकड़ों बोलियाँ प्रचलित हैं।
- एआई-आधारित अनुवाद तकनीक न्यायिक दस्तावेजों एवं निर्णयों को भाषाई बाधाओं से परे अधिक सुलभ बना सकती है।
- सुवास (SUVAAS—सर्वोच्च न्यायालय विधिक अनुवाद सॉफ्टवेयर) परियोजना के माध्यम से हजारों न्यायिक निर्णयों का क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है।
- सटीकता में वृद्धि: एआई महत्त्वपूर्ण साक्ष्यों की उपेक्षा को कम कर सकता है तथा आपराधिक न्याय प्रक्रिया को अधिक सूक्ष्म, सटीक एवं विश्वसनीय बना सकता है।
- न्याय तक पहुँच में सुधार: एआई-आधारित चैटबॉट एवं वर्चुअल सहायक, विशेष रूप से बिना विधिक प्रतिनिधित्व वाले वादकारियों को न्यायिक प्रक्रियाओं को समझने, वाद की स्थिति जानने तथा याचिकाएँ दाखिल करने में सहायता प्रदान कर सकते हैं।
चिंताएँ/चुनौतियाँ
- पूर्वाग्रह एवं अत्यधिक निर्भरता: एआई-आधारित विधिक अनुसंधान में खोज संबंधी पूर्वाग्रह उत्पन्न हो सकता है, जिससे प्रासंगिक न्यायिक नज़ीरें छूट सकती हैं।
- एआई पर अत्यधिक निर्भरता न्यायनिर्णयन को केवल नियम-आधारित निष्कर्षों तक सीमित कर सकती है तथा मानवीय विवेक एवं परिस्थितिजन्य विश्लेषण की उपेक्षा कर सकती है।
- डेटा संरक्षण एवं गोपनीयता : न्यायिक डेटा के संग्रहण एवं उपयोग के संबंध में स्पष्ट विधिक एवं संस्थागत ढाँचे के अभाव में गोपनीयता एवं डेटा सुरक्षा संबंधी चिंताएँ बनी हुई हैं।
- अवसंरचनात्मक कमियाँ : अनेक न्यायालयों में असमान इंटरनेट कनेक्टिविटी, पुराने हार्डवेयर तथा सीमित तकनीकी विशेषज्ञता जैसी समस्याएँ विद्यमान हैं।
- नैतिक चुनौतियाँ: दंड निर्धारण (Sentencing) तथा पैरोल (Parole) जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में एआई के उपयोग से निष्पक्षता, न्याय तथा नैतिक उत्तरदायित्व संबंधी प्रश्न उत्पन्न होते हैं।
- मानवीय अंतर्दृष्टि का अभाव: एआई ऐसे सूक्ष्म मानवीय एवं परिस्थितिजन्य पहलुओं की उपेक्षा कर सकता है, जिनके मूल्यांकन के लिए मानवीय संवेदनशीलता, अनुभव एवं न्यायिक विवेक आवश्यक होता है।
आगे की राह
- एआई के उपयोग के संबंध में ऐसा संतुलित दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए, जिससे गोपनीयता, नागरिक स्वतंत्रताओं तथा नैतिक मानकों की रक्षा सुनिश्चित हो, साथ ही इसके दुरुपयोग को प्रभावी ढंग से रोका जा सके।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता का विवेकपूर्ण एवं उत्तरदायी उपयोग भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली को अधिक दक्ष, सुलभ, पारदर्शी एवं न्यायसंगत बना सकता है, बशर्ते इसके संभावित जोखिमों एवं चुनौतियों के समाधान हेतु पर्याप्त संस्थागत एवं विधिक सुरक्षा उपाय सुनिश्चित किए जाएँ।
स्रोत: TH
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